सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया, सरकार अपने कर्मचारियों के साथ भेदभाव नहीं कर सकती


नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि सरकार अपने कर्मचारियों के साथ भेदभाव नहीं कर सकती। कोर्ट ने साफ किया कि अगर अस्थायी कर्मचारी भी स्थायी कर्मचारियों की तरह ही काम कर रहे हैं, तो उन्हें मिलने वाले लाभों से वंचित रखना गलत है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने पटना हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें डाक विभाग में दशकों तक सेवा देने वाले अस्थायी कर्मचारियों को पेंशन देने से मना कर दिया गया था।
अदालत ने कहा कि कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के मामले में समान होने के बावजूद किसी एक वर्ग को लाभ न देना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारी, चाहे वे कैजुअल हों या अस्थायी, उन्हें सामाजिक सुरक्षा और पेंशन जैसे लाभों से दूर नहीं रखा जा सकता। बेंच ने कहा कि सरकार कर्मचारियों को अनिश्चित स्थिति में रखकर उनसे स्थायी कर्मचारियों जैसा काम नहीं ले सकती। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह डाक विभाग में कैजुअल लेबर के रूप में काम करने वाले पूर्व कर्मचारियों या उनके कानूनी वारिसों को तीन महीने के भीतर पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ जारी करे। यदि इसमें देरी होती है, तो सरकार को छह प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज भी देना होगा। कोर्ट ने पाया कि इन कर्मचारियों को अस्थायी दर्जा तो मिला था और उन्हें ग्रुप डी के समान लाभ भी दिए जा रहे थे, लेकिन प्रशासनिक ढिलाई की वजह से इन्हें कभी औपचारिक रूप से स्थायी नहीं किया गया। अदालत ने राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह मजदूरों के लिए सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करे। पेंशन कोई खैरात या इनाम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक कल्याण और आर्थिक न्याय का एक हिस्सा है। कोर्ट ने 2013 के एक फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि पेंशन एक अर्जित लाभ है जो कर्मचारी की लंबी सेवा के बदले मिलता है। यह संविधान के अनुच्छेद 300्र के तहत संपत्ति की तरह है और इसे कानून के बिना नहीं छीना जा सकता।
निजता का अधिकार असीमित नहीं
सत्य की खोज को निजता से ऊपर करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पितृत्व से जुड़े विवादों में अदालतें डीएनए जांच का आदेश दे सकती हैं, बशर्ते मामले के निपटारे के लिए यह आवश्यक हो और उपलब्ध अन्य साक्ष्य विवाद का निर्णायक समाधान देने में सक्षम न हों। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि निजता का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन यह पूर्ण या असीमित अधिकार नहीं है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि मामले में पितृत्व का प्रश्न सीधे तौर पर विवाद का केंद्र है और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई अन्य साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जो इस मुद्दे का निश्चित समाधान कर सके। अदालत ने यह भी माना कि पूर्व में चली भरणपोषण की कार्यवाहियां संक्षिप्त प्रकृति की थीं और उन्हें अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। पीठ ने अपने फैसले में कहा कि निजता का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन यह पूर्ण या असीमित अधिकार नहीं है।

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