नई दिल्ली:सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी की उस दलील पर सवाल उठाए, जिसमें उसने पश्चिम बंगाल के बेलडांगा में हुई हालिया हिंसा को आतंकी कृत्य बताते हुए यूएपीए के तहत जांच को सही ठहराया था। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने अभी तक मामले से जुड़ी फाइलें एनआईए को सौंपी ही नहीं हैं। कोर्ट ने एनआईए से कहा कि बिना केस डायरी और दस्तावेज देखे यह कहना कि यूएपीए की धारा 15 लागू होती है, जल्दबाज़ी है।
जस्टिस बागची ने साफ शब्दों में कहा कि हर हिंसक या भावनात्मक घटना को देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए खतरा नहीं माना जा सकता और इस तरह का निष्कर्ष पहले से तय कर लेना सही नहीं है। जस्टिस बागची ने कहा कि अप्रैल 2025 में हमने इस तरह की हिंसा देखी और राज्य सरकार ने भी सहमति जताई। शीर्ष अदालत ने यह राय व्यक्त की कि इस मामले को कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा स्वयं ही सुलझाना सबसे अच्छा होगा बशर्ते वह एनआईए द्वारा सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत की जाने वाली रिपोर्ट में इस संबंध में दिए गए बयान की जांच करे। जस्टिस बागची ने कहा कि उच्च न्यायालय में वापस जाएं और पुनर्विचार के लिए याचिका दायर करें। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि यूएपीए लागू किया जाना चाहिए या नहीं हम एनआईए से इस संबंध में एक रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत करने के लिए कहेंगे।
जमानत याचिका में आपराधिक इतिहास बताना अनिवार्य
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जमानत की मांग करने वाले हर अभियुक्त को अपने आपराधिक इतिहास का पूरा खुलासा हलफनामे के साथ करना अनिवार्य होगा। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि जमानत याचिका दाखिल करते समय आरोपी की जिम्मेदारी है कि वह सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को निष्पक्ष और स्पष्ट रूप से अदालत के सामने रखे। यदि कोई तथ्य छिपाया जाता है या आंशिक जानकारी दी जाती है, तो इसे कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि जमानत पर फैसला केवल कानूनी औपचारिकता नहीं है, बल्कि न्यायिक विवेक का गंभीर प्रयोग है। इसलिए अदालत के समक्ष पूरी सच्चाई रखना आवश्यक है। अदालत ने यह भी कहा कि इस निर्णय की प्रति सभी उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों को भेजी जाए, ताकि वे अपने नियमों में आवश्यक संशोधन या प्रशासनिक दिशा-निर्देश जारी कर सकें। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए पूर्ण और ईमानदार खुलासा अनिवार्य है। जमानत का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन यह पारदर्शिता और सत्यनिष्ठा की शर्त पर ही मिल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी की दलील पर उठाए सवाल