विंध्यभारत, रीवा
अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा के हिंदी विभाग एवं पर्यावरण जीवविज्ञान विभाग तथा हिंदी भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र का भव्य आयोजन आज विश्वविद्यालय के पं शंभुनाथ शुक्ल सभागार में संपन्न हुआ।
उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में माननीय कुलगुरु, जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर प्रो. राजकुमार आचार्य जी उपस्थित रहे। बीज वक्ता के रूप में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के प्रोफेसर प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे एवं वरिष्ठ बघेली साहित्यकार डॉ. चंद्रिका प्रसाद चंद्र ने अपने विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता माननीय कुलगुरु, अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा प्रो. राजेंद्र कुमार कुड़रिया ने की।
संगोष्ठी के संयोजक डॉ. अतुल कुमार तिवारी, विभागाध्यक्ष, पर्यावरण जीवविज्ञान विभाग तथा आयोजक सचिव डॉ. अनुराग तिवारी, सहायक प्राध्यापक हिंदी विभाग रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इसके उपरांत स्वागत भाषण एवं विषय प्रवर्तन डॉ. अतुल कुमार तिवारी द्वारा किया गया। उन्होंने आज के दिन को प्रवासी भारतीय दिवस के रूप में रेखांकित करते हुए अवधारणा पर प्रकाश डाला। उन्होंने भाषाएँ अनेक, भाव एक की महत्ता बताते हुए कहा कि भाषाओं का एकीकरण राष्ट्र के विकास में सहायक होता है। भाषाई द्वंद्व को समाप्त करने तथा भाषाई भेदभाव को कम करने हेतु माननीय प्रधानमंत्री द्वारा प्रारंभ किए गए काशी–तमिल संगम जैसे प्रयासों की सराहना की।
मुख्य वक्ता डॉ. चंद्रिका प्रसाद चंद्र ने अपने उद्बोधन में कहा कि भाषा और संस्कृति एक-दूसरे की पूरक हैं तथा विशेष रूप से दक्षिण भारतीय भाषाओं, खासकर तमिल भाषा, को उदारतापूर्वक स्वीकार करने की आवश्यकता पर बल दिया। मुख्य अतिथि प्रो. राजकुमार आचार्य ने भाषाई एकता पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हृदय में समानता ही सच्ची एकता है। उन्होंने सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया: का उल्लेख करते हुए कहा कि सभी प्राणियों का कल्याण तभी संभव है जब हमारा भाषाई एवं सामाजिक पर्यावरण स्वस्थ हो। उन्होंने पंच परिवर्तन के माध्यम से पर्यावरण की अवधारणा को भी परिभाषित किया तथा कहा कि विद्या वही है जो बंधनों से मुक्त करे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. राजेंद्र कुमार कुड़रिया ने कुटुंब प्रबोधन पर बल देते हुए कहा कि व्यक्ति के भीतर के भाव ही उसके स्वरूप का निर्माण करते हैं। उन्होंने कहा की प्राथमिक आवश्यकताओं को सही दिशा देने की आवश्यकता बताई, क्योंकि वही भविष्य के निर्माता हैं। उन्होंने समाज में राष्ट्रीय चेतना के जागरण, “ङ्क से विरासत, ङ्क से विकास” की अवधारणा तथा भारतीय भाषाओं की सांस्कृतिक जड़ों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संस्कृत भारतीय भाषाओं की परिष्कृत एवं मातृभाषा है, जिससे अनेक भाषाओं का उद्गम हुआ है।
इस अवसर पर स्मारिका तथा भारतीय भाषा परिवार विषय पर लिखित दो विद्वतापूर्ण ग्रंथों का विमोचन सम्मानित मंच द्वारा किया गया।
कार्यक्रम का आभार प्रदर्शन डॉ. अनुराग तिवारी ने किया, जबकि मंच संचालन डॉ. नीति मिश्रा एवं डॉ. समता शुक्ला द्वारा किया गया।
संगोष्ठी के तकनीकी सत्र में प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे (बीएचयू, वाराणसी) ने भाषा और जेनेटिक्स विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। इसके पश्चात डॉ. चंद्रिका प्रसाद चंद्र, डॉ. रामनरेश तिवारी ‘निष्ठुर’ एवं वरिष्ठ पत्रकार डॉ. जयराम शुक्ला ने हिंदी भाषा पर अपने रोचक एवं ज्ञानवर्धक विचार प्रस्तुत किए। तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. जगजीवन लाल तिवारी ‘कक्का’ ने की।
कार्यक्रम में विंध्य क्षेत्र के अनेक साहित्यकार, विभिन्न महाविद्यालयों के प्राध्यापकगण, विश्वविद्यालय के शिक्षक, अतिथि विद्वान, शोधार्थी तथा बड़ी संख्या में छात्र -छात्राएँ उपस्थित रहे।