महंगाई के दौर में मजाक! रोगियों को 24 रुपए का भोजन

रीवा। प्रदेश के शासकीय कार्यालयों में जहां बड़े अधिकारी दिनभर में 40 से 60 रुपये का बोतल बंद पानी पी जाते हैं, तो अस्पतालों में रोगियों के भोजन के लिए सरकार एक समय का मात्र 24 रुपये ही दे रही है। इसमें नाश्ता और भोजन दोनों शामिल हैं। वर्ष 2014 तक रोगियों के भोजन का बजट प्रतिदिन 40 रुपये था, जिसे 2017 में 48 रुपये किया गया। तब से बढ़ोतरी नहीं की गई। इतनी ही राशि में दूध, फल और पौष्टिक भोजन देने का दावा किया जाता है, पर जिस तरह से महंगाई बढ़ी है उससे समझा जा सकता है कि रोगियों को भोजन कैसा मिल रहा होगा।

पिछले आठ वर्ष से बढ़ोतरी नहीं की गई, जबकि कच्चे माल जैसे दाल, चावल तेल आदि की कीमतें दो से तीन गुना तक बढ़ गई हैं। रेट लिस्ट में उल्लेखित दरें हास्यास्पद हैं। दो रुपये में एक कटोरी सलाद और पांच रुपये में चार रोटी देने की बात मेन्यू में लिखी है। दूध 68 रुपये लीटर मिल रहा है, पर मेन्यू में 10 रुपये में 250 एमएल दूध और चार बिस्कुट देने की बात है। ऐसे अन्य सामग्री की दरों को जोड़ते हुए 48 रुपये का बजट निर्धारित किया गया है। इसमें भी रोगियों को भोजन उपलब्ध कराने वाले ठेकेदार कमाई कर रहा होगा तो सच्चाई में रोगी के खाने पर कितने रुपये खर्च किए जा रहे हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं है।
सीएचसी, सिविल अस्पताल, जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज सभी जगह यही स्थिति है। शासकीय आयुर्वेद और होम्योपैथी अस्पतालों में भी यही दरें हैं। रोगी वैसे ही हैं, पर एम्स में खाने का बजट 150 रुपये प्रतिदिन है। वहीं गुजरात में 120 रुपये और राजस्थान में 78 रुपये निर्धारित है। मध्य प्रदेश में कैदियों के भोजन पर 60 से 70 रुपये खर्च किए जाते हैं।
सरकार में कई निर्णय तो मिनटों में हो जाते हैं पर रोगियों के भोजन के बजट की फाइल दो वर्ष से अधिक समय से चल रही है। दो वर्ष पहले बजट बढ़ाकर 200 रुपये प्रतिदिन करने का प्रस्ताव स्वास्थ्य संचालनालय की तरफ से भेजा गया, जिसे वित्त विभाग ने अस्वीकृत कर दिया। उसके बाद दोबारा प्रस्ताव भेजा गया है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के अनुसार बढ़ी महंगाई के आधार पर निर्णय होगा।

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