बालिगों को अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार
श्रीनगर :जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने कहा कि जब दो बालिग अपनी मर्जी से शादी करने का फैसला करते हैं तो इसके लिए परिवार, समुदाय या बिरादरी की सहमति जरूरी नहीं है। ऐसे मामलों में दोनों की सहमति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कोर्ट ने परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी करने वाले एक कपल को सुरक्षा देने का भी निर्देश दिया, जिन्हें अपने रिश्तेदारों से हिंसा और उत्पीडऩ का डर था।
कोर्ट ने कहा कि जब दो बालिग अपनी मर्जी से एक-दूसरे को जीवनसाथी चुनते हैं, तो यह उनके व्यक्तिगत फैसले और स्वतंत्रता का हिस्सा है। संविधान भी उनके इस अधिकार को मान्यता देता है। अदालत ने यह भी कहा कि व्यक्तिगत पसंद के अधिकार को परिवार की इज्जत, सामाजिक प्रतिष्ठा या सामूहिक सोच के नाम पर दबाया नहीं जा सकता। यदि किसी व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार जीवनसाथी चुनने से रोका जाता है तो उसकी गरिमा और स्वतंत्रता प्रभावित होती है। कोर्ट के अनुसार, जब दो बालिग अपनी सहमति से जीवनसाथी चुनते हैं तो यह उनकी संवैधानिक स्वतंत्रता से जुड़ा मामला है। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की गरिमा उसकी स्वतंत्रता और पसंद से जुड़ी होती है। यदि किसी को अपनी मर्जी से जीवन जीने या अपना जीवनसाथी चुनने की आजादी नहीं मिलती तो उसके सम्मानजनक जीवन के अधिकार का पूरा अर्थ खत्म हो जाता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब दो बालिग अपनी इच्छा से शादी करते हैं तो उनके इस अधिकार में हस्तक्षेप करना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। संवैधानिक अदालतों की जिम्मेदारी है कि वे लोगों की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा करें। कोर्ट ने साफ किया कि सुरक्षा देने के आदेश का मतलब यह नहीं है कि उसने शादी को कानूनी रूप से प्रमाणित कर दिया है या दोनों की शादी करने की पात्रता पर अंतिम फैसला सुना दिया है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि दोनों में से किसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज है तो पुलिस नियमानुसार जांच जारी रख सकती है।

