संत, ऋषि और तपस्वी समाज की ढाल
नागपुर । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भगवत ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक विरासत और संतों की शिक्षाओं ने ऐतिहासिक रूप से देश को वैश्विक उथल-पुथल का सामना करने और संकट के समय मार्गदर्शन प्रदान करने में सक्षम बनाया है। उन्होंने कहा कि जब भी दुनिया संकटों में घिरी होती है, हमारा राष्ट्र ही वह शक्ति बनकर उभरता है जो उसे उस संकट से बाहर निकालता है। मानव अस्तित्व का सच्चा परिप्रेक्ष्य हमारे इसी आध्यात्मिक ज्ञान में निहित है।
सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जब भौतिकवाद, संकीर्णतावाद और उपभोक्तावाद के तूफान बाहरी दुनिया से आते हैं, जो अक्सर अन्य समाजों को तबाह कर देते हैं, तो वे लहरें हमारे ऊपर से गुजर जाती हैं; हम अडिग और अपरिवर्तित खड़े रहते हैं। इस लचीलेपन का कारण इसी आध्यात्मिक ज्ञान में निहित है। यह हमारे संतों के प्रति कृतज्ञता का ऋणी है। इसलिए यहाँ श्रद्धा अर्पित करना और इन संतों की शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन में आत्मसात करने का प्रयास करना हमारा कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि ग्रीस, मिस्र और रोम जैसी ऐतिहासिक सभ्यताएँ लुप्त हो गई हैं, लेकिन भारत में एक ऐसा विशेष गुण है जो इसके निरंतर अस्तित्व को सुनिश्चित करता है। उन्होंने कहा कि ग्रीस, मिस्र और रोम, सभी पृथ्वी से लुप्त हो गए हैं निश्चित रूप से हममें कुछ ऐसा विशेष है जो यह सुनिश्चित करता है कि हमारा अस्तित्व कभी मिट न सके। भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि संतों और ऋषियों से निरंतर प्राप्त होने वाला आध्यात्मिक ज्ञान भारत का एक अनूठा और स्थायी सार है। उन्होंने कहा कि यह स्थायी सार वह ज्ञान है, वह आध्यात्मिक ज्ञान जो हमें अपने संतों और ऋषियों से निरंतर प्राप्त होता है। यह आध्यात्मिकता का वह ज्ञान है जो शेष विश्व और अन्य राष्ट्रों के लिए अज्ञात रहा, फिर भी हमारे पूर्वजों ने इसे खोजा। परिणामस्वरूप, जब भी विश्व किसी संकट में घिर जाता है, जब भी मानवता लडख़ड़ाती है, हमारा राष्ट्र बार-बार उस संकट से विश्व को बाहर निकालने वाले देश के रूप में उभरता है। भागवत ने कहा कि हिंदू समाज की धीरे-धीरे अनुकूलन करने की क्षमता संतों, ऋषियों और तपस्वियों के निरंतर प्रभाव के कारण है।
जब भी विश्व संकट में घिरा भारत ने ही हमेशा रास्ता दिखाया :भागवत