सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों को लगाई लताड़, केवल बहसबाजी की कला दिखाने के लिए न आएँ


वकील न्याय देने के सिस्टम का हिस्सा
नई दिल्ली:सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी प्रेक्टिस करने वाले वकीलों को पब्लिक का कीमती समय बर्बाद करने के खिलाफ चेतावनी दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वकील न्याय देने के सिस्टम का हिस्सा है। कोर्ट ने कहा कि वकीलों से उम्मीद नहीं की जाती वह सिर्फ अपनी बहस करने के स्किल दिखाने के लिए सिद्धांतों के खिलाफ बहस के नियमों को तोड़ेंगे। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और एन वी अंजारिया की बेंच शिकायतकर्ता रोमा आहूजा की दो क्रिमिनल अपीलों पर सुनवाई कर रही थी।
कोर्ट ने कहा “वकील न्याय देने के सिस्टम का हिस्सा हैं और उनसे यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे तय सिद्धांतों के खिलाफ या तय कानून के खिलाफ बहस करने के लिए खेल के नियमों को तोड़ेंगे। जहां कानून का कोई मुद्दा पहले से तय हो चुका है, वहां बहस छोड़ देना एक प्रोफेशनल कला है। यह कोर्ट के सामने प्रोफेशनल व्यवहार में नैतिकता का हिस्सा है। सिर्फ बहस करने का हुनर दिखाने के मकसद से वकीलों को ऐसे सबमिशन देकर कोर्ट का कीमती पब्लिक टाइम बर्बाद नहीं करना चाहिए जो पहले से मौजूद मिसाल के खिलाफ बेकार हैं।”सुप्रीम कोर्ट ने तय कानूनी बातों को मानने को एक प्रोफेशनल हुनर बताया। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि बेबुनियाद दलीलें देने से कोर्ट का समय बर्बाद होता है और न्याय में देरी होती है। उन्होंने कहा कि एथिकल एडवोकेसी के लिए मुवकिल के हित और कोर्ट के प्रति ड्यूटी के बीच बैलेंस बनाना ज़रूरी है। बेंच ने कहा कि जस्टिस सिस्टम न केवल जजों पर बल्कि वकीलों के जि़म्मेदाराना कंडक्ट पर भी निर्भर करता है। जज ने कहा “वकीलों से भी उम्मीद की जाती है कि वे उस फैसले से निकलने वाले मजबूत-ऑपरेटेड प्रीडिक्ट का सम्मान करें, जब तक कि फैसले को अलग करने के लिए कोई खास आधार मौजूद न हों।” कानूनी मुद्दे पर फैसला करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अनुशासन बनाए रखने में वकीलों की भूमिका पर ज़रूरी बातें कहीं। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि वकील सिफऱ् अपने क्लाइंट के प्रतिनिधि ही नहीं हैं, बल्कि कोर्ट के अधिकारी भी हैं और न्याय देने के सिस्टम का जरूरी हिस्सा हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि एक बार जब कोई कानूनी मुद्दा संविधान बेंच द्वारा पूरी तरह से सुलझा लिया जाता है, तो वकीलों से उम्मीद की जाती है कि वे उस मिसाल का सम्मान करेंगे, जब तक कि उसे अलग करने के लिए कोई खास और सही आधार न हों।
महंगाई का दबाव कर्मचारी और पेंशनभोगी के बीच भेदभाव नहीं करता
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि महंगाई की भरपाई के लिए दिए जाने वाले भत्तों को बढ़ाते समय, सरकार सेवारत कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के बीच भेदभाव नहीं कर सकती. अदालत ने कहा कि महंगाई का दबाव किसी कर्मचारी और पेंशनभोगी के बीच अंतर नहीं करता है.”जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कहा “हमारी राय में जब ये लाभ एक समान उद्देश्य के लिए दिए जाते हैं और महंगाई से जुड़े होते हैं, और महंगाई का दबाव किसी नौकरी कर रहे कर्मचारी और पेंशनभोगी के बीच भेदभाव नहीं करता, तो महंगाई भत्ते और महंगाई राहत को बढ़ाने के लिए अलग-अलग दरें तय करने का कोई तार्किक आधार नहीं है. यह कदम न केवल भेदभावपूर्ण है, बल्कि मनमाना भी है.” सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि आर्थिक तंगी कुछ लाभों के वितरण को टालने का एक बड़ा कारण हो सकती है, या यह लाभकारी योजनाओं को लागू करने के लिए अलग-अलग तारीखें तय करने का आधार बन सकती है.

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