समाज को बांटने वाली परंपराएं हिंदू धर्म के लिए ठीक नहीं’: सुप्रीम कोर्ट

किसी को मंदिर में प्रवेश से रोकना हिंदू धर्म को बांटने जैसा
नई दिल्ली: सबरीमला पुनर्विचार याचिकाओं से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों ने ऐसी प्रथाओं के खिलाफ चेतावनी दी, जो सांप्रदायिक आधार पर पूजा स्थलों में प्रवेश को रोकती हैं. न्यायाधीशों ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि ऐसा करना “समाज को बांटने” जैसा होगा. इनमें से एक जज ने कहा कि हिंदू धर्म की समावेशी भावना को बहिष्कार की परंपराओं से कमजोर नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि “इसका हिंदू धर्म पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा” और “हर मंदिर और मठ तक हर किसी की पहुंच होनी चाहिए.
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा “सबरीमला विवाद को एक तरफ रख दें, तो यहां एक बड़ी आशंका है. सबरीमला को छोडक़र भी, हर व्यक्ति की पहुंच हर मंदिर और मठ तक होनी चाहिए.”जस्टिस नागरत्ना ने चेतावनी दी “अगर आप यह कहते हैं कि ‘यह एक प्रथा है और धर्म का मामला है कि केवल मेरे संप्रदाय के लोग ही मेरे मंदिर में आएंगे और कोई नहीं’, तो यह हिंदू धर्म के लिए अच्छा नहीं है. इसे ध्यान में रखें.” इस पर जस्टिस कुमार ने कहा “ऐसा करके आप समाज को बांट रहे होंगे.” जस्टिस नागरत्ना उनकी बात से सहमत हुईं और कहा “धर्म पर इसका प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडऩा चाहिए.”जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “सबरीमला विवाद को अलग रखकर सोचें. सामान्य तौर पर अगर आप यह कहें कि यहां केवल गौड़ सारस्वत ब्राह्मण ही आएंगे, या कांची मठ के अनुयायी केवल कांची जाएंगे और उन्हें श्रृंगेरी नहीं जाना चाहिए, तो यह सही नहीं है. देखिए लोग जितना ज्यादा अलग-अलग जगहों पर जाएंगे, धर्म की ताकत उतनी ही बढ़ेगी मंदिरों तक सबकी पहुंच होनी चाहिए.”जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अनुच्छेद के तहत सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप कर सकती है कि समाज के सभी वर्गों को मंदिर में प्रवेश मिले.
बाल तस्करी पर तुरंत कदम नहीं उठाए तो हालात होंगे बेकाबू
देश में बढ़ते बाल तस्करी के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संगठित गिरोह देशभर में सक्रिय हैं और अगर राज्य सरकारों व केंद्र शासित प्रदेशों ने तुरंत प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत निगरानी कर सकती है लेकिन वास्तविक कार्रवाई राज्य सरकार, पुलिस और संबंधित एजेंसियों को ही करनी होगी। पीठ ने कहा कि कुछ मामलों में बच्चों की बरामदगी से यह स्पष्ट है कि समस्या से निपटा जा सकता है लेकिन इसके लिए जरूरी राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति फिलहाल नजर नहीं आ रही है। कोर्ट ने कहा कि कई राज्यों द्वारा दाखिल अनुपालन रिपोर्ट सिर्फ औपचारिकता हैं। मध्य प्रदेश के गृह सचिव ने देरी पर माफी मांगी जिस पर कोर्ट ने अंतिम मौका देते हुए चेतावनी दी कि आगे भी लापरवाही बरती गई तो संबंधित राज्यों को डिफॉल्टर घोषित किया जाएगा।

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