भोजशाला मस्जिद की सर्वे पर मुस्लिम पक्ष की आपत्तियों पर विचार करे हाई कोर्ट :सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट विवादित भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद परिसर की वीडियोग्राफी और रंगीन तस्वीरों सहित चल रहे आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया सर्वे के बारे में मुस्लिम पक्ष की आपत्तियों पर विचार करेगा.यह मामला चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और विपुल एम पंचोली की बेंच के सामने आया.
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की कार्यवाही में दखल देने से इनकार कर दिया, लेकिन उसने इस बात पर जोर दिया कि वैज्ञानिक सर्वे के बारे में सभी आपत्तियों पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार सुनवाई होनी चाहिए.सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने इन आपत्तियों के लिए प्रोसीजरल टाइमलाइन पर पहले ही बात कर ली है. बेंच ने कहा कि वीडियोग्राफी कोर्ट में दिखाई जाएगी, ताकि सभी पक्ष सर्वे रिपोर्ट की स्वीकार्यता और वीडियोग्राफी के संबंध में सही होने के बारे में सही टिप्पणी कर सकें. बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों का जिक्र किया और कहा कि हाई कोर्ट ने अंतरिम आदेश दिया था और कहा कि वह आखिरी सुनवाई के चरण पर आपत्तियों पर सुनवाई करेगा. बेंच ने कहा “हाई कोर्ट ने हमारे पहले के निर्देशों का पालन करते हुए आदेश दिया है. हमें कोई शक नहीं है कि हाई कोर्ट, वीडियोग्राफी देखने के बाद, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार आपत्तियों पर सुनवाई करेगा.”सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि उसने केस के मेरिट पर कोई राय नहीं दी है और पार्टियां किसी भी शिकायत के लिए हाई कोर्ट जाने के लिए आजाद हैं.
सरकार छोटे-छोटे मामलों को भी खींचकर सुप्रीम कोर्ट तक ले आती है
सुप्रीम कोर्ट ने एक सीआईएसएफ कांस्टेबल को मिली राहत के खिलाफ अपील करने पर केंद्र सरकार को फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि सरकार खुद अदालतों में मुकदमों का बोझ बढ़ाने के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदार है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार पर 25 हजार रुपये का जुर्माना ठोका है। सरकार छोटे-छोटे मामलों को भी खींचकर सुप्रीम कोर्ट तक ले आती है। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि हम हर जगह मुकदमों के बोझ का रोना रोते हैं। लेकिन असलियत यह है कि सरकार खुद सबसे बड़ी मुकद्मेबाज है। क्या सरकारी अफसरों को यह समझ नहीं आता कि 11 दिन की गैर-मौजूदगी के लिए नौकरी से निकाल देना गलत है? जब हाई कोर्ट ने राहत दे दी थी तो आपको सुप्रीम कोर्ट आने की क्या जरूरत थी?
न्याय नहीं, देरी व दबाव के लिए हो रहे कई मुकदमे
सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ते मुकदमों को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालतों में दाखिल हो रहे कई मामले न्याय पाने की वास्तविक इच्छा से कम और कार्यवाही में देरी करने, विरोधियों को परेशान करने तथा न्यायिक समय बर्बाद करने के उद्देश्य से अधिक प्रेरित दिखाई देते हैं। अदालत ने साफ किया कि न्यायिक व्यवस्था का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल वास्तविक और गंभीर विवादों का समाधान करना है, न कि बार-बार या बेतुके दावों को बढ़ावा देना। यदि कोई पक्ष जानबूझकर निरर्थक या परेशान करने वाले मुकदमे दायर करता है, तो अदालत ऐसे मामलों को खारिज करने के साथ-साथ जुर्माना भी लगा सकती है। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी एक विवाद को अलग-अलग तरीकों से बार-बार उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

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