बंगलुरू : सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने सामाजिक ताने-बाने को लेकर बड़ी बात कह दी है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने कहा कि 2047 तक ‘विकसित भारत’ का सपना केवल नारों से पूरा नहीं होगा। भुइयां ने कहा कि असहमति की आवाजों को दबाना, अंधाधुंध गिरफ्तारियां इस लक्ष्य की राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि बिना पर्याप्त सबूतों के की गई गिरफ्तारियां न केवल अदालतों पर बोझ बढ़ाती हैं बल्कि नागरिक स्वतंत्रता का भी हनन करती है। जस्टिस भुइयां ने कहा कि एक विकसित देश में आलोचना के लिए जगह होनी चाहिए, उसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि जिला अदालतों में 50 प्रतिशत से अधिक महिलाएं न्यायिक अधिकारी बन रही हैं लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंचते-पहुंचते यह संख्या क्यों गिर जाती है? उन्होंने कहा कि 1950 से अब तक सुप्रीम कोर्ट के 287 जजों में से केवल 11 महिलाएं रही हैं। उन्होंने कोलेजियम सिस्टम की ‘सब्जेक्टिविटी’ पर भी सवाल उठाया है। उनका मानना है कि जब तक चयन प्रक्रिया वस्तुनिष्ठ नहीं होगी, महिलाएं इस ‘कांच की दीवार’ को नहीं तोड़ पाएंगी। जस्टिस भुइयां ने कहा कि विकास का मतलब सिर्फ ऊंची इमारतें नहीं, बल्कि दलितों और पिछड़ों के प्रति सम्मान है। उन्होंने कहा कि जिस समाज में एक बच्चा दलित महिला के हाथ का बना खाना खाने से इनकार कर दे, वह विकसित होने का दावा नहीं कर सकता।
दमन और डर के साये में विकसित भारत संभव नहीं’: जस्टिस भुइयां