भारत का उत्थान भारत द्वारा ही निर्धारित होगा:विदेश मंत्री


नई दिल्ली। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया है कि भारत का वैश्विक पथ स्वयं निर्धारित है, और उन्होंने इस बात पर बल दिया कि देश का विकास उसकी घरेलू क्षमताओं और दृढ़ता पर आधारित है। रायसीना संवाद में बोलते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि यदि हमें हिंद महासागर से जुड़ी एक भावना या पहचान का निर्माण करना है, तो उसे संसाधनों, कार्यों, प्रतिबद्धताओं और व्यावहारिक परियोजनाओं से समर्थित होना होगा।
हिंद महासागर के निर्माण के कई आयाम हैं। हिंद महासागर एकमात्र ऐसा महासागर क्यों है जिसका नाम किसी देश के नाम पर रखा गया है क्योंकि हम इसके ठीक बीच में स्थित हैं। हमारे विकास से हिंद महासागर के अन्य देशों को लाभ होगा। जो हमारे साथ काम करेंगे, उन्हें अधिक लाभ मिलेगा। भारत का उदय हमारी शक्ति से निर्धारित होगा, न कि दूसरों की गलतियों से। जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि भारत ने इस क्षेत्र के विकास में निवेश किया है और भारत की वृद्धि से इस क्षेत्र के देशों को लाभ होगा। जयशंकर ने एक संवाद सत्र के दौरान कहा कि आज जब हम देशों के उत्थान की बात करते हैं, तो देशों का उत्थान खुद उन्हीं देशों द्वारा निर्धारित होता है। भारत का उत्थान भी भारत द्वारा ही निर्धारित होगा। उन्होंने किसी देश का नाम लिए बिना कहा कि यह हमारी ताकत से तय होगा, न कि दूसरों की गलतियों से। उन्होंने कहा कि जो हमारे साथ काम करेंगे उन्हें जाहिर तौर पर अधिक लाभ मिलेगा। मैं यह नहीं कह रहा कि भारत के विकास में कोई चुनौतियां नहीं हैं चुनौतियां तो हैं। लेकिन भारत के विकास की दिशा बिल्कुल स्पष्ट है। एक तरह से, यह रुकने वाला नहीं है। उन्होंने कहा कि अब कोई भी देश हर क्षेत्र में हावी नहीं रह सकता, बल्कि भविष्य में दुनिया बहुध्रुवीय होगी, जहां हर क्षेत्र और हर देश की ताकत मायने रखेगी। उन्होंने कहा कि बड़े समझौते और वैश्विक दबदबे का दौर समाप्त हो चुका है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अब नई दुनिया में हर राष्ट्र को योगदान देने का मौका मिलेगा और संतुलन ही नई शक्ति बनेगी।
बहुध्रुवीयता और बहुपक्षीयता में विरोधाभास नहीं
विदेश मंत्री ने कहा कि कुछ बड़े देश कभी-कभी सीमित मुद्दों पर अस्थायी समझौते कर सकते हैं, लेकिन अब कोई ऐसा बड़ा संपूर्ण सौदा नहीं होगा जिसे बाकी दुनिया को मानना पड़े। वह दौर समाप्त हो चुका है। जयशंकर ने यह भी स्पष्ट किया कि बहुध्रुवीयता और बहुपक्षीयता में विरोधाभास नहीं है। उन्होंने कहा कि बहुपक्षीय संस्थाओं की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करनी चाहिए कि बहुध्रुवीयता कमजोर हो। उन्होंने कहा कि अब ग्लोबल साउथ देशों के लिए नए प्लेटफॉर्म की जरूरत है। जयशंकर ने दोहराया कि बड़े देशों द्वारा अपनी शक्ति दिखाकर क्षेत्रीय या वैश्विक प्रभाव बनाना और बड़े व्यापक समझौते करना अब संभव नहीं है। दुनिया अब बहुध्रुवीय और संतुलित बनने जा रही है।

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