रीवा
विश्व एनजीओ दिवस के अवसर पर शासकीय ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय, रीवा के समाजशास्त्र विभाग द्वारा “सामाजिक परिवर्तन में गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका विषय पर एक भव्य विशेष व्याख्यान एवं संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम आदरणीय प्राचार्या डॉ. अर्पिता अवस्थी के मार्गदर्शन में तथा विभागाध्यक्ष डॉ. अखिलेश शुक्ल के संयोजन एवं डॉ. महानंद द्विवेदी के सहसंयोजन में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं पुष्प अर्पण के साथ हुआ। छात्राओं द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना ने वातावरण को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की। दीप प्रज्वलन की परंपरा ने ज्ञान, चेतना और सकारात्मक परिवर्तन का संदेश दिया।
संयोजक प्रोफेसर अखिलेश शुक्ल ने भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल मंत्र सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया: का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज-सेवा भारत की संस्कृति में नवीन अवधारणा नहीं, बल्कि सनातन जीवन-दृष्टि का अभिन्न अंग है। भगवद्गीता के लोकसंग्रह और निष्काम कर्म के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि सामाजिक उत्तरदायित्व प्रत्येक नागरिक का धर्म है। विश्व स्तर पर विश्व एनजीओ दिवस की स्थापना वर्ष 2010 में मानवतावादी चिंतक मार्सिस लिओर्स द्वारा की गई थी। 27 फरवरी 2014 को इसका प्रथम वैश्विक आयोजन फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी में सम्पन्न हुआ। यद्यपि यह दिवस आधुनिक काल में प्रारंभ हुआ, परंतु इसकी मूल भावना नि:स्वार्थ सेवा और लोककल्याण भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से निहित रही है।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सतना के समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. विनोद रस्तोगी ने अपने विस्तृत उद्बोधन में कहा कि गैर-सरकारी संगठन आधुनिक समाज में परिवर्तन के सशक्त साधन बन चुके हैं। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर वर्तमान तक स्वैच्छिक संगठनों की भूमिका का ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि सामाजिक परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है, जो आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और तकनीकी कारकों से प्रभावित होती है। केवल सरकारी नीतियाँ पर्याप्त नहीं; नागरिक सहभागिता अनिवार्य है। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकार और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में एनजीओ की सक्रिय भूमिका समाज में जागरूकता और सशक्तिकरण का माध्यम बन रही है। डॉ. रस्तोगी ने पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और सामुदायिक सहभागिता को एनजीओ की सफलता का आधार बताया। उन्होंने गीता के कर्मण्येवाधिकारस्ते सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि नि:स्वार्थ कर्म ही सामाजिक परिवर्तन की धुरी है।
कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. शाहिदा सिद्दीकी ने किया। अंत में डॉ. मधुलिका श्रीवास्तव ने आभार प्रदर्शन करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन विद्यार्थियों में ‘कर्तव्यबोध’ और ‘सेवा-भाव’ का जागरण करते हैं। इस अवसर पर उपस्थित प्राध्यापकगण डॉ. मुकेश शाह, डॉ. मधुलिका श्रीवास्तव, डॉ. शाहिदा सिद्दीकी, डॉ. फरजाना बानो, डॉ. प्रियंका पांडे, डॉ. निशा सिंह, डॉ. प्रियंका तिवारी, डॉ. शिल्ली जैन, डॉ. नारायण द्विवेदी, डॉ. मंजुश्री मिश्रा, श्री योगेश निगम एवं श्री रत्नेश की सक्रिय सहभागिता उल्लेखनीय रही। कार्यक्रम में यह संदेश प्रमुखता से उभरा कि सामाजिक परिवर्तन किसी एक संस्था का कार्य नहीं, बल्कि सामूहिक संकल्प का परिणाम है। भारतीय चिंतन के “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “लोकसंग्रह” के आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। टी.आर.एस. महाविद्यालय का समाजशास्त्र विभाग इस प्रकार के ज्ञानवर्धक आयोजनों के माध्यम से विद्यार्थियों को संवेदनशील, जागरूक एवं उत्तरदायी नागरिक बनाने की दिशा में सतत प्रयासरत है। विश्व एनजीओ दिवस पर आयोजित यह विशेष व्याख्यान निश्चय ही विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायी और अविस्मरणीय सिद्ध हुआ।
टी.आर.एस. कॉलेज, रीवा में विश्व एनजीओ दिवस पर विशेष व्याख्यान