न्यायालय सत्ता की संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा करते हैं :सीजेआई


न्यायाधीश को अपने दायित्व में एक संरक्षक के रूप में दृढ़ रहना चाहिए
रायपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के सम्मान में एक गरिमामय अभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि छत्तीसगढ़ भारत की विविधता का लघु रूप है। “छत्तीसगढ़” नाम का पारंपरिक अर्थ “छत्तीस किलों की भूमि” माना जाता है। उन्होंने प्रतीकात्मक रूप से कहा कि ये किले केवल रक्षा संरचनाएं नहीं थे बल्कि शासन, प्रशासन और सामुदायिक जीवन के केंद्र थे। वे केवल सैन्य शक्ति से नहीं बल्कि जिन मूल्यों की रक्षा करते थे उनसे सुदृढ़ बने रहे।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संवैधानिक न्यायालयों को लोकतंत्र के आधुनिक किलों के रूप में देखा जा सकता है। वे भूभाग की नहीं, अधिकारों की रक्षा करते हैं; वे सीमाओं की नहीं, बल्कि सत्ता की संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा करते हैं। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट भारत की सबसे युवा संवैधानिक संस्थाओं में से एक है। जब अपेक्षाकृत युवा हाई कोर्ट अपने कार्य का विस्तार करता है और अपनी संस्थागत उपस्थिति को सुदृढ़ बनाता है तो वह पदानुक्रम नहीं बल्कि संवैधानिक परिवार के भीतर भाईचारे की भावना को दर्शाता है। यद्यपि छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट आयु में युवा है, किंतु उसने अपने उच्च मानदंड और परंपराएं स्थापित कर ली हैं। चीफ जस्टिस ने कहा कि न्यायिक अकादमी केवल प्रशिक्षण संस्था नहीं है, बल्कि वह स्थान है जहां न्यायपालिका की भावी शक्ति का निर्माण होता है। उन्होंने कहा कि दूरी या दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता। राज्य के प्रत्येक भाग में संस्थागत उपस्थिति और संवेदनशीलता बनाए रखते हुए न्यायपालिका यह सुनिश्चित कर सकती है कि न्याय प्रत्येक नागरिक तक पहुंचे, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में निवास करता हो। अपने संबोधन में भारत के चीफ जस्टिस ने कहा कि सम्मान के अवसर सामूहिक गौरव के क्षण होते हैं। ये संस्थाओं को एक-दूसरे को गहराई से समझने का अवसर प्रदान करते हैं। ये केवल कृतज्ञता ही नहीं, बल्कि आत्मचिंतन के भी अवसर होते हैं। उन्होंने बल देकर कहा कि प्रत्येक न्यायाधीश को अपने दायित्व में एक संरक्षक के रूप में दृढ़ रहना चाहिए। साथ ही उन्होंने इस बारे में भी सावधान किया कि न्यायालय स्वयं को समाज से पृथक नहीं कर सकते। जो न्यायालय स्वयं को सीमित कर लेता है, वह अप्रासंगिक होने का जोखिम उठाता है।

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