शिक्षा विभाग में फर्जी अनुकंपा नियुक्तियो का लंबा इतिहास?

सिटीरिपोर्टर,रीवा

शिक्षा विभाग में फर्जी अनुकंपा नियुक्ति का सिलसिला कब से चल रहा है इसकी सम्पूर्ण जांच होना असंभव लगता है। किसी ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर लिपिक के पद पर नियुक्ति प्राप्त किया तो किसी ने चपरासी के पर नियुक्ति प्राप्त कर लिया। कुछ प्रकरणों की जांच भी हुई किन्तु दोषियों के खिलाफ प्रभावी तरीके से कार्रवाई नहीं हुई। कुछ प्रकरणों की जांचें पूर्ण होने एवं ऊपर से निर्देश होने के बाद भी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाई। कुछ प्रकरणों में शिकायतें होने के बाद भी आज तक जांच ही नहीं हो पाई। कुछ प्रकरणों में अभी तक जांच ही चल रही है और वह भी निर्णायक स्थिति में नहीं पहुच पाई। ऐसी स्थिति में सवाल यह उठता है कि जब विभाग, प्रशासन व शासन ही फर्जी अनुकंपा नियुक्तियों की जांच करवाने एवं प्रभावी कार्रवाई करने में अक्षम साबित हो रहा हो तब जरूरी हो जाता है कि जांच किसी अन्य एजेंसी से करवाई जाय।
दोषी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं
वास्तव में फर्जी अनुकंपा नियुक्तियां सरकारी विभागों में तब होती है जब वहां का सरकारी तंत्र इस तरह के कृत्य में शामिल हो जाता है। इस तरह के मामले में न केवल कर्मचारी शामिल होते हैं अपितु अधिकारी भी शामिल रहते है। ऐसे लोग फसतें हैं तो बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। किसी को दोषी होने के बाद भी दोषी नहीं माना जाता तो कोई निर्दोष होने के बाद भी सुरक्षित बचा रहता है। किसी के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई होती है और फिर कुछ समय के बाद बहाली हो जाती है तो कोई कोर्ट के माध्यम से स्थगन के आधार पर बहाल हो जाता है। विडम्बना यह भी है कि फर्जी अनुकंपा नियुक्तियों में यदि पुलिस में एफआईआर होती है तो आरोपियों के खिलाफ भी कार्रवाई नहंी हो पाती। यहां तक कि विवेचना के नाम पर प्रकरण को लंबे समय तक खीचने की कोशिश होती है। अदालत में पुलिस चालान प्रस्तुत नहींं कर पाती। जहां ऐसे मामलों में पुलिस अधिकारियों को प्राथमिकता के साथ समीक्षा कर आरोपियो के खिलाफ चालान प्रस्तुत करवाने के प्रयास होने चाहिये वहां कोई चर्चा ही नहीं होती।
गायब हो जाती है नस्तियां, नहीं होती दोषियों पर कार्रवाई
यह भी देखा जा सकता है कि फर्जी अनुकंपा नियुक्तियों के प्रकरण में सुनियोजित तरीके से नस्तियों को ही गायब करवा दिया जाता है। नस्ती ही गायब हो जायेगी तो साक्ष्य ही समाप्त हो जायेगा। न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी की तर्ज पर साजिस पर साजिस चलती रहती है। पता नहीं कितनी नस्तियां फर्जी अनुकंपा नियुक्तियों की गायब हो चुकी है यह खोज का विषय है। सवाल यह उठता है कि आखिर नस्तियां जब किसी न किसी लिपिक के प्रभार में रहती हैं तो वे गायब कैसे हो जाती हैं? इस तरह का उल्लेख फर्जी अनुकंपा नियुक्तियों की हुई जांचों में किया गया है। जबकि किसी भी लिपिक का जब प्रभार बदलता है कि नियमानुसार अभिलेखों की प्रभार सूची तैयार की जाती है, प्रभारी सूची के आधार पर अभिलेखों का मिलान किया जाता है। इस तरह की प्रक्रिया लगातार शाखा परिवर्तन के दौरान चलती रहती है। किन्तु यहां कई बार यह भी होता है कि बिना प्रभार सूची के ही प्रभार हो जाते हैं और कार्यालय प्रमुख ध्यान नहीं देते अथवा उनके संरक्षण में ऐसा किया जाता है।

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