विंध्यभारत, रीवा
रीवा शहर से महज़ 18 किलोमीटर दूर, गुढ़ विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम पंचायत गोरगी—जहां कदम रखते ही ऐसा प्रतीत होता है मानो समय थम गया हो यह क्षेत्र पुरातन धरोहरों, अद्भुत स्थापत्य कला और मनमोहक प्राकृतिक दृश्य से सुसज्जित है। यहां पत्थरों में उकेरी गई प्राचीन कलाकृतियां, दुर्गनुमा चबूतरे, प्राचीन बावड़ी और एक ऐतिहासिक किले के अवशेष आज भी उस गौरवशाली अतीत की कहानी कहते हैं, जो कभी इस भूमि ने जिया था। इसी ऐतिहासिक भूखंड पर स्थित है उत्तर मुखी हनुमान जी का प्राचीन मंदिर, जिसे डोगरी नाथ स्वामी के नाम से जाना जाता है। मंदिर में हनुमान जी बाल स्वरूप में विराजमान हैं। यह स्थान न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि आध्यात्मिक चेतना और संस्कारों का संगम भी है। ग्रामीणों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण नवमी शताब्दी में करचूली वंश के शासक महाराजा करनडहरिया के शासनकाल में हुआ था। कहा जाता है कि उनके समय में यह क्षेत्र सुख-समृद्धि, व्यापार और विकास का प्रमुख केंद्र था। आज भी यहां मौजूद किले का टीला, खंडित मूर्तियां और पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी उस समृद्ध सभ्यता की साक्षी हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर के नीचे एक प्राचीन बावड़ी स्थित है, और उस बावड़ी से एक रहस्यमयी सुरंग निकलती है, जो सीधे ढुढेश्वर नाथ मंदिर के कुंड से जुड़ती है। क्षेत्र में बिखरी अनेकों मूर्तियां यह दर्शाती हैं कि यहां के निवासी प्राचीन काल से ही संस्कृति, कला और धर्म से गहराई से जुड़े हुए थे।यह संपूर्ण क्षेत्र आज एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहर के रूप में जाना जाता है। यहां पुरातत्व सर्वेक्षण से जुड़े अवशेष प्राप्त हुए हैं और पुरातत्व विभाग का बोर्ड भी स्थापित है, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को प्रमाणित करता है इतना ही नहीं, स्थानीय जानकारों के अनुसार इस क्षेत्र में अनेकों दुर्लभ औषधीय वनस्पतियां भी पाई जाती हैं। कुछ औषधि विशेषज्ञों का दावा है कि यहां मौजूद वनस्पतियों में पाए जाने वाले औषधीय गुणों से कई गंभीर बीमारियों का उपचार संभव है।