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कहां तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए। कहां चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।।

शिवेंद्र तिवारी

सतना|| यहाँ दरख़्तों के साए में धूप लगती है, चलें यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।

न हो क़मीज़ तो पाँव से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए।

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही, कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए।

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता, मैं बे-क़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए।
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मशहूर कवि दुष्यंत की यह कविता मानो आज के सतना के लिए ही लिखी गई है। लिजलिजी जनता, नाकारा विपक्ष और आत्ममुग्ध जनप्रतिनिधि। किसी को किसी से कोई मतलब नहीं। पक्ष बस एक ढोल बजा रहा की बेपनाह विकास हो रहा, विपक्ष घर बैठे विकास के नाम पर चूड़ियां फोड़ रहा और जनता विकास खोज रही। एक दशक से लगभग यही हो रहा।
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दरअसल जनप्रतिनिधियों को ये कब समझ आएगा कि “विकास विज्ञप्तियों में लिखी इबारत नहीं है, बल्कि जमीन पर इठलाने वाला ढांचा होता है, जो नदारद है”
यहां के नेताओं ने क्रेडिट वार और आत्म प्रशंसा के लिए जो नुकसान शहर, जिले और गांवों का किया है वो इतिहास में लिखा जाएगा।
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विकास की दु-र्गाथा की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन हालिया मामला हवाई अड्डे का है।
कल रीवा में 72 सीटर विमान उतरा। ये रीवा सहित विंध्य के लिए गौरव का विषय है। लेकिन मेरी नजर में ये सतना के लिए एक शर्मिंदगी का विषय भी है। रीवा में एक इंच जमीन न होने पर भी भू अर्जन कर आज सतना से बड़ा हवाई अड्डा बना दिया गया। वहीं सतना में एक हजार एकड़ की जमीन होने के बाद भी हवाई अड्डा में एक छोटा प्लेन उतारने के लिए हवाई पट्टी विस्तार की जगह नहीं है।
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अब तो हंसी आती है उस वक्त को सोच कर जब इसका उन्नयन हो रहा था हमारे नेता सपने दिखाते थे 19 सीटर विमान आयेगा, हालत ये है 9 सीटर विमान नहीं उतर पा रहा।
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ये वही सतना हैं जब विंध्य में कोई बड़ी हस्ती आती थी तो उनका विमान सतना हवाई अड्डे पर उतरता था और यहां से कार या हेलीकॉप्टर से वो अन्य जिलों में जाते थे। आज इसका उल्टा हो गया है। लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकारी जमीन अतिक्रमण मुक्त नहीं कराई जा पा रही।
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नेताओं को इस शर्म पर कोई फर्क नहीं पड़ता लिहाजा कोई सवाल नहीं हो रहे, कोई प्रयास नहीं हो रहे।… क्योंकि वो सब बेशर्मी की चादर तानकर उत्सव मना रहे हैं।।।

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