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कहां तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए। कहां चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।।

शिवेंद्र तिवारी सतना|| यहाँ दरख़्तों के साए में धूप लगती है, चलें यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए। न हो क़मीज़ तो पाँव से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए। ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही, कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए। वो…

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