शिवेंद्र तिवारी 9179259806

रीवा की संस्कृति और कला को नई पहचान देने के उद्देश्य से सिविल लाइंस क्षेत्र में करीब सात साल पहले जिस कृष्णा राजकपूर ऑडिटोरियम का निर्माण कराया गया था, वह आज अपनी मूल पहचान खो चुका है। यह वही ऑडिटोरियम है, जिसे द ग्रेट शोमैन राजकपूर और उनकी धर्मपत्नी कृष्णा कपूर की स्मृति में समर्पित किया गया था। वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल और प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे के सुझाव पर इसका नाम रखा गया था — कृष्णा राजकपूर ऑडिटोरियम। उद्देश्य था — रीवा को एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का कला केंद्र और संस्कृति का मंच देना।
लेकिन आज, सात साल बाद यह सपना धूल में मिल गया है।
जिस अत्याधुनिक ऑडिटोरियम की डिजाइन में लाइट, साउंड, माइक्रोफोन, स्टेज सेटअप और आर्ट गैलरी जैसी आधुनिक सुविधाओं का वादा किया गया था, वह सब कागजों तक ही सीमित रह गया। ऑडिटोरियम की डिजाइन से छेड़छाड़ की गई, योजनाबद्ध गैलरी कभी बनी ही नहीं, और सबसे शर्मनाक बात — छत पर लगने वाली लाल गुंबद टोपी, जो इसकी पहचान बनने वाली थी, आज तक नहीं लगाई गई।
2 जून 2018 को बड़े उत्साह के साथ इस ऑडिटोरियम का लोकार्पण हुआ था। वक्ताओं ने कहा था — “यह मंच रीवा को बॉलीवुड और अंतरराष्ट्रीय फिल्म जगत से जोड़ेगा, यहां कला और कलाकारों को नई दिशा मिलेगी।” लेकिन लोकार्पण के बाद से आज तक कपूर परिवार से जुड़ा कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम यहां आयोजित नहीं हुआ।
कला केंद्र के नाम पर छल:
यह भवन, जो कल्चरल सेंटर के रूप में विकसित किया जाना था, अब शादी-ब्याह और राजनीतिक आयोजनों का गढ़ बन चुका है। प्रशासन ने कभी इसके व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगाने के आदेश दिए थे, लेकिन वो आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए। शहर के कलाकार, रंगकर्मी और साहित्यकार खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं — उन्हें न मंच मिला, न अवसर।
कपूर परिवार की नाराजगी:
सूत्रों के अनुसार, कपूर परिवार इस पूरे घटनाक्रम से आहत है। उन्हें यह जानकर हैरानी हुई कि जिस कृष्णा राजकपूर ऑडिटोरियम को उनकी स्मृति में कल्चरल सेंटर के रूप में स्वीकृति दी गई थी, वहां अब विवाह और प्राइवेट पार्टियां हो रही हैं।
रीवा की कला भावना पर सवाल:
रीवा, जिसने देश को दिग्गज कलाकार और फिल्म जगत के नाम दिए — अब उसी शहर में कला केंद्र का नाम ‘कृष्णा राजकपूर’ होकर भी, कला का कोई नामोनिशान नहीं बचा है।
यह कहानी सिर्फ एक ऑडिटोरियम की नहीं, यह रीवा की सांस्कृतिक आत्मा के क्षरण की कहानी है।
यह सवाल उठता है — आखिर प्रशासन की यह “समदड़िया पर मेहरबानी” क्यों? क्यों कला केंद्र को विवाह भवन में बदल दिया गया? और आखिर क्यों कलाकारों के सपनों को योजनाओं की फाइलों में दफन कर दिया गया?
रीवा के लोग आज पूछ रहे हैं:
क्या ‘कृष्णा राजकपूर ऑडिटोरियम’ सचमुच कला का केंद्र बनेगा, या यह हमेशा सत्ता और सियासत की चमक में दबा रहेगा?